53 साल बाद फिर इतिहास की पुनरावृत्ति


 इतिहास के घटनाक्रम अक्सर दोहराए जाते है.!मप्र की सियासत में फिलहाल यही हुआ। 53 बर्ष पहले नेहरू के सबसे विश्वसनीय औऱ राजनीति के चाणक्य पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र के सियासी रुतबे औऱ हनक को सिंधिया राजघराने ने जमीदोज किया था।  1967 पार्ट -2 मानो 2020 में दोहराया गया औऱ इस बार भी नेहरू गांधी खानदान के सबसे चहेते कमलनाथ की कुर्सी चली गई है। कारण फिर से सिंधिया राजघराना ही बना है। बस पीढ़ीगत अंतर है।पचमढ़ी के अधिवेशन में तबके मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा ने राजमाता सिंधिया को अपमानित करने की कोशिश की थी राजमाता ने  संकल्प लेकर  डीपी मिश्रा को सत्ता से बेदखल कर दिया था। राजमाता तब कांग्रेस में ही थी। कमलनाथ की कुर्सी भी कमोबेश उसी अंदाज में चली गई माध्यम बने राजमाता सिंधिया के प्रपौत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया । संयोग से वे भी कांग्रेस में थे और उन्हें भी डीपी मिश्रा की तर्ज पर कमलनाथ ने सड़क पर उतरने की चुनौती दी थी।
इस सियासी घटनाक्रम को सिंधिया परिवार के इतिहास की उस पृष्ठभूमि में देखे जाने की जरूरत भी है जो बुनियादी रूप से कांग्रेस वैचारिकी के विरुद्ध रहा है । यह जानना भी आवश्यक है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता स्व.माधवराव सिंधिया ने अपनी राजनीति की शुरुआत जनसंघ के साथ की थी। 1971 में माधवराव सिंधिया जनसंघ के टिकट पर पहली बार  गुना से लोकसभा में पहुँचे थे। उसके बाद 1977 के आम चुनाव में भी वे जनसंघ की मदद से निर्दलीय  जीतकर सांसद बने थे। इससे पहले उनकी मां 1967 में तबके चाणक्य कहे जाने वाले मप्र के मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा की सरकार को चुनौती देकर जमींदौज कर चुकी थी। इसलिये मप्र की सियासत में सिंधिया परिवार और बीजेपी के साथ रिश्ते की केमेस्ट्री पीढ़ीगत ही कही जा सकती है। यह भी तथ्य है कि बीजेपी ने कभी भी पार्टी अलग रहते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया औऱ  उनके पिता स्व.माधवराव सिंधिया को बड़ी चुनावी चुनौती पेश नही की। 1996 में नरसिंहराव ने माधवराव सिंधिया को कांग्रेस का टिकट हवाला कांड का आधार बनाकर नही दिया था। तब बीजेपी ने विकास कांग्रेस बनाकर ग्वालियर से लड़े माधवराव सिंधिया के विरुद्ध अपना प्रत्याशी ही खड़ा नही किया था। 1984 में सिंधिया से चुनाव हारने के बाबजूद अटल जी ने कभी राजमाता औऱ स्व.सिंधिया के प्रति राजनीतिक बैर भाव नही रखा। राजमाता सिंधिया ने बीजेपी और संघ के आधार को खड़ा करने में आर्थिक योगदान भी दिया।
इतिहास साक्षी है कि ग्वालियर राजघराने का आग्रह सदैव कांग्रेस की रीतिनीति से मेल नही खाता था। आजादी के बाद पूरे भारत में जब नेहरू और कांग्रेस का डंका बज रहा था तब ग्वालियर रियासत में हिन्दू महासभा की ताकत चरम पर थी। गुना,ग्वालियर, राजगढ़, उज्जैन, इंदौर,मन्दसौर,विदिशा,तक हिन्दू महासभा के आगे कांग्रेस खड़ी नही हो पा रही थी। कांग्रेस आलाकमान खासकर नेहरू को ग्वालियर रियासत की हिन्दुत्वपरस्ती बहुत खटकती रहती थी। राजमाता सिंधिया की जीवनी के अनुसार आजादी के बाद पंडित नेहरू और सरदार पटेल ग्वालियर आये। नेहरू जब भाषण देकर निबटे तो  सभा मे गिनती के लोगों ने तालियां बजाई पर जब जीवाजीराव खड़े हुए तो जनता गगनभेदी जिंदाबाद करने लगी। नेहरू इस वाकये से बेहद नाराज हो गए। नेहरू और सिंधिया के रिश्ते कभी सामान्य नही हुए। वेशक नेहरू के कहने पर राजमाता सिंधिया ने 1957 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन यह केवल सिंधिया परिवार और नेहरू खानदान के मध्य रिश्तों के सामान्यीकरण का प्रयास भर था। जब इंदिरा गांधी ने राजाओं के प्रिवीपर्स समाप्त किये तो इसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट जाने वालों में माधवराव सिंधिया  सबसे आगे थे।